मेरे अपने घर के भी सौ दर्द— मेरी राह देखते हैं।
अजीब मुक़ाम से गुजरा है क़ाफ़िला ज़िंदगी का ,
जैसे सदियों से तेरे ऊपर कोई बोझ थे हम…!!
जिसे चाहे उसी से सबसे ज़्यादा दर्द पाता है।
पर किसी ने उसके चेहरे से वो हँसी ही छीन ली,
यहां सीने से लगाकर, लोग दिल निकाल लेते है…!
आँसू को बहुत समझाया कि तन्हाई में आया करो,
क्योंकि फूलो पर कभी इत्र नही लगाया जाता…!
लेकिन आँख बंद करते ही इरादे बदल जाते है…
सुना है गैरो ने पैरो तले रक्खा है तुम्हे…!
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तुमने रास्ते बदले तो मैने सफ़र ही छोड़ दिया।
ना वो हमारा हो सका ना प्यार दोबारा हो सका..!!
मुझे वहाँ से समझो… जहाँ मैं ख़ामोश हो जाता हूँ,